यह सुगंध है अन्तर्मन की
गीत - कवि अंशुल नभ
Thursday, October 1, 2015
Friday, December 18, 2009
अपने अहसास मे डुबकी न लगा पाये हम
सिर्फ गंगा मे नहाने से फायदा क्या है
नेह की भावना खेले ही नही दिल मेँ अगर
शीश पत्थर पे झुकाने से फायदा क्या है
कोई भी मनुष्य ऐसा नही जिसके आत्म-सागर मे कोई भावना लहर बनकर नही उछलती हों, ऐसा कोई मनुष्य नही , जिसके अंदर प्रेम की कल्पना नही पलती हो, .............. जरुरी नही, भावना, शब्द का रूप ही धारण करे तभी काव्य होगा , भावना अंतस मे बहे और आनन्द की अनुभूति करवाये, काव्य का प्रारम्भ तो वही से है ..............पृथ्वी पर प्रत्येक मनुष्य कवि है ........अपने जीवन का ..... जो रचता है पग-पग अपने अनुभव ........अपने जीवन के पृष्ठों पर ........अपनी आत्मा से .............. तो कैसे कहू कि काव्य अछूता है किसी भी मनुष्य से ................... ............... यधपि मै यह मानता हूँ कि विधाता ने किसी किसी को वो शक्ति दी है जो अपनी भावनाओं को उतार सकते है शब्दों के रूप मे अपने पृष्ठों पर ..............और गढ सकते है कविता अपनी भाषा मे ............. मै भी उनमे से ही भाग्यवान मनुष्य, जिसने कोशिश की है स्वयं को पढने की और धरा पर अपने अस्तित्व को गढ्ने की ............ ......... कविता के माध्यम से ...........कवि अंशुल नभ के नाम से ..................
अंशुल नभ - ८९६०६६६९७१
इसके बाद भी कुछ और अपने बारे मे सोचता हूँ, तो काव्य दिशा परिवर्तित कर लेता है तब लेखनी क्या लिखती है........ आगे पढिये .........
.............कभी कोशिश की अपने बारे मे सोचने की, तो चिंतन अनन्त गहराईयों तक चला जाता है, किंतु भावाव्यक्ति तो उन्ही शब्दो के माध्यम से होती है जिसमे सारी भाषा को पिरोया गया है, कहने का तात्पर्य है कि भावना को अभिव्यक्त करने के लिये अगल से कोई शब्द नही मिलते, कविता को या भावो को उन्ही शब्दो मे व्यक्त कर पाते है जितने शब्दो मे भाषा का निर्माण हुआ है ...............अपने बारे कहने की कोशिश की है .........
किसी हृदय की पीर नही मै, किसी नयन का नीर नही
खिला हुआ इक फूल शाख पर, खंजर या शमशीर नही
चाहत के अधरो पर शोभित एक प्यार का गीत हूँ मैं
कंगन की खन-खन से उभरा, पायल का संगीत हूँ मैं
मानवता के घावों पर मैं मरहम बनकर टपका हूँ
धूप ने जब तन-मन झुलसाया,शवनम बनकर टपका हूँ
जिसने बोले शब्द प्यार के, उसने ही पाया मुझको
जिसमें नफरत बसी हुई हो मैं ऐसी तस्वीर नही
खिला हुआ इक फूल शाख पर, खंजर या शमशीर नही
अपने आप मे मस्त हूँ इतना जैसे कोई शराबी हो
यूँ लगता है प्यार का साया सर पर सदा गुलाबी हो
जहाँ खिलें हर पल मुस्कानें खुशियों का वह आँगन हूँ
मुझको खुद भी नही पता है कितना शीतल पावन हूँ
हूँ इतना अनमोल कि मेरे आगे ताजमहल फीका
और गरीब मैं इतना जैसे कोई आज फकीर नही
खिला हुआ इक फूल शाख पर, खंजर या शमशीर नही
खुद से हार चुका हूँ, कैसे किसी विजय की बात करूं
कोई नाम नही है मेरा, किस परिचय की बात करुं
आंसू पर रिश्ते उपजाये, रंग मंच से दूर रहा
मन को सीधापन पहनाया, छल प्रपंच से दूर रहा
मेरी सोचों का नाता तो शब्दों की दुनिया से है
पग-पग खेल तमाशे रचकर,क्यों अभिनय की बात करुं
कोई नाम नही है मेरा, किस परिचय की बात करुं
भावुकतायें भाव संजोती, धडकन गीत बनाती है
कंठ कहाँ गाता है मेरा, अंतरात्मा गाती है
आंसू की छलकन से खुद ही बंधे हुए है सातों स्वर
नही जरुरत कल-कल झरने,सुर या लय की बात करूं
कोई नाम नही है मेरा, किस परिचय की बात करुं
कभी कभी तो इतना भी अपने बारे मे लिखा जाता है जो यथार्थ के धरातल पर खडे होकर तो सोचा ही नही जा सकता , पर सत्य से नाता तो रखता है ................कुछ गीत ऐसे ही अनायास ही निकल पडते है आत्मा से ..................कवि अंशुल नभ
कभी कभी तो जीवन मे ऐसे भी काव्य प्रयोग उमडकर आ जाते जो माँ को और ईश्वर दोनो को समान रूप से समर्पित हो जाते है
जानें एक छोटे से गीत के माध्यम से .............
हर कवि ने, लेखक ने माँ के लिये कुछ न कुछ लिखा अवश्य है, चिंतन की बात है जहाँ मां के लिये इतना कुछ लिखा गया है, तो वृद्ध माँ – बाप के लिये क्यो रखा जाता है वृद्ध – आश्रम मे .......... कहाँ चले जाते है संस्कार ......... बर्तमान मे किये कर्मो का फल भविष्य मे ही अपना रंग दिखाता है .......................................कवि अंशुल नभ
कहा जाता है की मित्रता अगर सच्ची है तो उससे अच्छा सम्बन्ध मनुष्य को दूसरा नहीं मिल सकता ..........दोस्ती पर बहुत कुछ लिखा गया, पढा गया और आजकल तो मोबाईल संदेशों द्वारा सबसे अधिक सन्देश भी दोस्ती के किये जाते है, मैंने तो एक उम्मीद के साथ कविता लिखी ,,, हर उस मित्र के लिए जो सच्चा है ..............
तब अहसासो के कौने ने, अपनी यादें भरना साथी
‘दीप बुझें, आशाये टूटें, आंसू जब उतरे आंखो से
तब तुम मेरे सूने मन मे, बनकर नेह बिखरना साथी
बस तुम इतना करना साथी
जब मेरा तन शिथिल शिथिल सा, हो जाये असमर्थ धरा पर
तब करके स्पर्श मुझे तुम, मेरा जीवन तरना साथी
ग़ज़लों के जहां से
१.
दहकती ज़िंदगी में और ज्वाला छोड़ देती है
.................... एक सत्य का, जो झुठलाया नही जा सकता .........वह माँ, जिसके अस्तित्व के आगे स्वमं ब्रह्मा भी खुद को अस्तित्वहीन मानते होगे , एक माँ जिसके आँचल मे सिर रखकर विश्वेश्वर भी सोया है ...............तो मन माँ के अहसास को कैसे स्वीकार न करे ..............मै माँ से कहता हूँ कि.......... हे माँ तेरा स्नेह पाकर मै खुद को इस दुनिया का सबसे भाग्यशाली पुरुष मानता हूँ ............
तेरा अनंत स्नेह तो मुझ पर वो आँचल फैलाए हुए है, जिसकी छाया मै रहकर मुझे म्रत्यु का भी भय नहीं लगता..........
स्वर्ग की सीढीयाँ चढी मैने
गोद मे माँ के सिर रखा जब भी
हादसे फूल बनके बरसे है
उसका स्नेह छू लिया जब भी
और अंतस कहता है .......
उसकी खुशियो मे है खुशी मेरी
उसके कदमो मे जिंदगी मेरी
उसकी साँसों मे साँस लेता हूँ
माँ की आँखें है रौशनी मेरी .........
माँ अपना आशीष देती है तो लगता है कि वह कह रही हो........ कि
सोने चाँदी से कुछ नही होता
आसरा पास रख् दुआओं का
टूट जाये जो आईना दिल का
क्या असर होगा फिर दवाओं का
जानें एक छोटे से गीत के माध्यम से .............
हर सपना साकार हो गया
तन मे,मन मे, वन उपवन मे
वचनो के सुरभित आँगन में
संचित, आशंकित, अनुवन्धित
अपने छोटे से जीवन मे
माना जब आभार तुम्हारा
सुखमय यह संसार हो गया
हर सपना साकार हो गया
दिल का एक अनमोल समर्पण
सौंपा जब तेरी धडकन को
हुईं सुगन्धित मेरी साँसें
छुआ जहाँ भी तेरे मन को
जब भी तेरी यादें आईं
मेरे घर त्यौहार हो गया
हर सपना साकार हो गया
इतराकर जब गई हवायें
बरस पडी घनघोर घटायें
सम्भव हैं सब भूली यादें
मेने घर बापस आ जायें
सोचा जब भी तुझे ह्रदय से
शब्द-शब्द उद्दगार हो गया
हर सपना साकार हो गया
जब काव्य-यात्रा की शुरुआत मे कवियों से मिलना जुलना प्रारम्भ हुआ, तब भान नही था कि कविता की भाषा क्या है, कविता का इन्द्र धनुष किस रंग का होता है, कविता की माँग कैसे भरी जाती है, कविता के अपने परिधान मे कौन सी खुश्बू मनुष्य को सम्मोहित करती है ................ तब कविता को जिस रूप मे सोचता था, वैसे ही पृष्ठों पर अंकित करना बड़ा कठिन था, आज चिंतन मे पहले की अपेक्षा एकाग्रता आई तब कविता के स्नेह को हाथ लगा पाया , ,............................ माँ सरस्वती की असीम कृपा से...........................
कविता पढ़ें कल्पना और यथार्थ के मध्य से निकलती हुई नदी की तरह ......
सजीले स्वप्न,नशीले नयन,रंगीले भाव,सुरीले गीत
तुम्हारे साथ मुझे यह धरा,स्वर्ग के जैसी हुई प्रतीत
ह्रदय पर खुशियों का अवतरण, अधर पर वचनों का उत्कर्श
खिलाकर चला गया मधुमास, तुम्हारा एक सजल स्पर्श
दिया तुमने ऐसा स्नेह, कि नाचे मन मे मुक्त मयूर
प्यास की मांगों मे भर दिया,त्रप्ति का मान भरा सिन्दूर
तुम्हारे साथ मिली हर बार, दुखों को हार,सुखों को जीत
तुम्हारे साथ मुझे यह धरा,स्वर्ग के जैसी हुई प्रतीत
मुझे गाकर तुमने कर दिया, मौन से एक सुरीला गान
खिलाती है अंतस मे कमल, तुम्हारी मीठी सी मुस्कान
गुजारे मैने जो दिन रात, तुम्हारे सम्मोहन मे प्राण
सभी बन गये सुखो का रूप, स्वप्न भी नही रहे बेजान
भावना भक्ति बन गई स्वयं.तुम्हारे दर्शन से मनमीत
तुम्हारे साथ मुझे यह धरा,स्वर्ग के जैसी हुई प्रतीत
जहां तक तुमने थामा हाथ, साथ मे चलती रही बहार
जहां तक तुमने अपना कहा, पूजता रहा मुझे संसार
हुआ सत्कार हजारों बार, समय ने पहनाई जयमाल
देखकर मुझे तुमहारे साथ, हुये चुप दर्दों के भूचाल
तुम्हारी खुश्बू क्या मिल गई,हो गया सारा जनम पुनीत
तुम्हारे साथ मुझे यह धरा,स्वर्ग के जैसी हुई प्रतीत
साधना अपनी जगह होती है किंतु मानसिक संतुलन भी अपनी जगह होता है, अगर काव्य जीवन में भावनाओं की उर्जा मिल जाती है तो काव्य और भी अच्छा निखर आता है,
जब काव्य लेखन के धरातल पर चलना शुरु किया, तब आस पास के बातावरण ने तो साथ नही दिया पर जिसने मेरी मानसिक-पहलुओं को असीम शक्ति दी, जिसने मेरी लेखनी को साथ साथ थामा, जिसने मुझे समय समय पर एक साहस दिया मंच पर खडे होने का ................ वह एक महान व्यक्तित्व की रूप मे हमेशा मेरे हृदय मे रहते हैं ....................स्यमं मेरे पिताजी है............. जब बह मेरी कविता सुनकर मुस्कराते है तब मेरी कविता को लय मिलती है और मेरे जीवन को असीम साहस ........ जमाने की भीड मे चलने का ................................
वर्तमान मे हिन्दी कविताओ का लेखन तो काफि कम नजर आ रहा है ........अधिकांश कवि गजलो की तरफ ही ध्यान दे रहे है............ लेकिन मुझे मिली है एक दिशा, एक उत्साह, हिन्दी गीत लिखने के लिये, जिसके पीछे आशीर्बाद है मेरे गुरु आदरणीय नसीर परवाज़ का (गज़लों के मूर्धन्ध हस्ताक्षर) ............. जिनकी प्रेरणा से आज जीवित हूँ मैं हिन्दी कविताओ में ..............................
मुझमें कोई ज्ञान न चिंतन न दर्शन है ना इतिहास
मुझको तो बस याद हैं केवल परिभाषायें प्यार भरीं
मुझे ज्ञात है क्यों आँखों मे घुल जाता है गंगाजल
मुझे भान है किसको छूकर महका करता है सन्दल
मुझसे पूछो आँख चुराती है किसकी जलती ज्वाला
मुझे खबर है क्यों इक भवरा माँग रहा है मधुशाला
मेरे शब्द महकते पल-पल बिछुडे स्वप्न मिलाने को
मुरझाई शाखों पर इक नन्हा आभाष खिलाने को
इसीलिये मैनें समझीं हैं सभी व्याथयें प्यार भरीं
मुझको तो बस याद हैं केवल परिभाषायें प्यार भरीं
प्रेम-विरह मे मौन आत्मा गा लेती है कितना कुछ
बिना लिये कुछ भी चाहत मे दे देती है कितना कुछ
भाषा नही भावना सम्वर्धित करती है भावों को
प्रेम सुगन्धित कर देता है मन के सभी गुलाबो को
यधपि लोग समझते है कि प्रेम सिर्फ पागलपन है
लेकिन मैने कहा, प्रेम तो सिर्फ सत्य का दर्पण है
वो क्या समझें, नही लगी हों जिसे हवायें प्यार भरीं
मुझको तो बस याद हैं केवल परिभाषायें प्यार भरीं
इसीलिये तो राजमहल को कुटिया अच्छी लगती है
इसीलिये तो राधा को बासुरियाँ अच्छी लगती है
इसीलिये तो एक चकोरा चन्दा देख के रोता है
इसीलिये तो पागल भवरा अपना जीवन खोता है
इसका कारण एक मात्र ही, दिल से दिल का मिलना है
अनतर्मन मे अपनेपन की नेह किरण का खिलना है
होता उनके साथ यही, जो रीत निभाये प्यार भरीं
मुझको तो बस याद हैं केवल परिभाषायें प्यार भरीं
बस तुम इतना करना साथी
जब अंतर्मन दुखी हो उठे, ठुकरा दें मुझको अपने ही
जब अंतर्मन दुखी हो उठे, ठुकरा दें मुझको अपने ही
सच्चाई की आशा देकर, झूठे हो जाये सपने ही
उम्मीदें मुँह मोडें मुझसे, करे मित्रता जब तन्हाई
और रूठकर दूर चली जाये, मुझसे मेरे परछाई
तब अहसासो के कौने ने, अपनी यादें भरना साथी
बस तुम इतना करना साथी
‘दीप बुझें, आशाये टूटें, आंसू जब उतरे आंखो से
मधुमासी चेतनता छूटे, जब भी हरित ह्रदय पाखो से
बुझ जाये जब दीप द्वार के, आँगन मे पसरें सन्नाटे
पुष्प झरें, रोये बहार भी, चुभते रहें पाँव मे काटे
तब तुम मेरे सूने मन मे, बनकर नेह बिखरना साथी
बस तुम इतना करना साथी
जब मेरा तन शिथिल शिथिल सा, हो जाये असमर्थ धरा पर
रह न जाये शेष तनिक भी, जब मुझमे सामर्थ धरा पर
जब मेरे जीवन जीने का, कोई न निकले अर्थ धरा पर
जब मेरी साँसे ही मुझको, लगें समझने व्यर्थ धरा पर
तब करके स्पर्श मुझे तुम, मेरा जीवन तरना साथी
बस तुम इतना करना साथी
१.
दहकती ज़िंदगी में और ज्वाला छोड़ देती है
किसी की याद जब दिल में उजाला छोड़ देती है
ये जीवन की कबड्डी है संभलकर खेलना यारो
ये जीवन की कबड्डी है संभलकर खेलना यारो
जहां भी टूटती है सांस पाला छोड़ देती है
तरक्की और तहजीबों के सपने, सपने रहते हैं
तरक्की और तहजीबों के सपने, सपने रहते हैं
जहां यह उम्र अपनी पाठशाला छोड़ देती है
गरीबी नालियों से भी उठा लाती है सिक्कों को
गरीबी नालियों से भी उठा लाती है सिक्कों को
अमीरी थालियों में भी निवाला छोड़ देती है
अमीरी मखमली राहों पे भी चलती नही अक्सर
अमीरी मखमली राहों पे भी चलती नही अक्सर
गरीबी बेजुवां पैरों में छाला छोड़ देती है
२.
समंदर ने दी मुझको आशा बहुत है
२.
समंदर ने दी मुझको आशा बहुत है
मगर इस ह्रदय में पिपाशा बहुत है
नही बन सका मैं मुहब्बत की मूरत
नही बन सका मैं मुहब्बत की मूरत
मगर खुद को मैंने तराशा बहुत है
मिला वो मुझे मेरे दिल में महकता
मिला वो मुझे मेरे दिल में महकता
जिसे सारे जग में तलाशा बहूत है
हमें मत खरीदो यहाँ मूल्य देकर
हमें मत खरीदो यहाँ मूल्य देकर
इधर तो मुहब्बत की भाषा बहुत है
उजाले है लाखों मेरी शायरी में
उजाले है लाखों मेरी शायरी में
मगर ज़िंदगी में कुहासा बहुत है
तिरे प्यार से ऐ मुझे ज़िंदगानी
न उम्मीद कम है न आशा बहुत है
३.
मिटाने आएगा फिर कौरवों का मान कोई तो
तिरे प्यार से ऐ मुझे ज़िंदगानी
न उम्मीद कम है न आशा बहुत है
३.
मिटाने आएगा फिर कौरवों का मान कोई तो
पुनः अवतार लेगा विश्व में भगवान् कोई तो
उसे इस दौर का अल्लाह कह देना जहां बालो
उसे इस दौर का अल्लाह कह देना जहां बालो
नज़र आ जाय धरती पर तुम्हे इंसान कोई तो
नये युग के ये दीपक हैं लड़ेंगे आखिरी दम तक
नये युग के ये दीपक हैं लड़ेंगे आखिरी दम तक
अगर आया कही धरती पे फिर तूफ़ान कोई तो
कभी दुनिया से फुरसत ले सवरना सजना जी भरकर
चला आया अगर दिल में कभी मेहमान कोई तो
४.
वक्त भी हँसकर निकल जाता है कितना कुछ
कभी दुनिया से फुरसत ले सवरना सजना जी भरकर
चला आया अगर दिल में कभी मेहमान कोई तो
४.
वक्त भी हँसकर निकल जाता है कितना कुछ
आदमी गिरकर संभल जाता है कितना कुछ
लोग तो अश्कों को बस पानी समझते हैं
लोग तो अश्कों को बस पानी समझते हैं
और आँखों से निकल जाता है कितना कुछ
जिंदगी का एक लम्हा भर गुजरने से
देखिये यादों में ढल जाता है कितना कुछ
ग़म की चिंगारी जहां दिल में धधकती है
जिंदगी का एक लम्हा भर गुजरने से
देखिये यादों में ढल जाता है कितना कुछ
ग़म की चिंगारी जहां दिल में धधकती है
मोमबत्ती सा पिघल जाता है कितना कुछ
क्या समझ पाई है ये दुनिया इसे अंशुल
क्या समझ पाई है ये दुनिया इसे अंशुल
एक ख़त जलने से जल जाता है कितना कुछ
अंशुल नभ्
बीते दौर से
अंशुल नभ्
बीते दौर से
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पहिनकर चोला अनासिर का हम अपनी रूह पर॥बेअसर कुछ बेहुनर कुछ बेखबर चलते रहे |
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चंद उम्मीदों पे जीता है आदमी अक्सर
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स्वप्न तो ऊचे रखो हरदम पहाड़ों कि तरह॥क्या हुआ जो रह रहे हम राइयों के दरमियां |
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ये महकती हुई पत्ती, मिठास शक्कर की ॥चाय जैसा ही सही, ज़िंदगी मे कुछ तो हो |
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